नैनीताल( एक लघुकथा)-६
मैं युवा नैनीताल के बारे में सोचता
कुछ हिमाच्छादित,
कुछ धूप में हूँ।
प्यार के प्रखर प्रहरों को
आता-जाता देख,
सोचता हूँ,नैनीताल को हारना नहीं चाहिए।
यह दृष्टि ही है
जो हमें बनाती-बिगाड़ती है,
गीता में श्रीकृष्ण भगवान कहते हैं-
" पुण्यो गन्धः पृथिव्यां ----"(मैं पृथ्वी की पुण्य सुगन्ध हूँ---)
बस, यही मान
झील को बार-बार देख
वृक्षों को बार-बार निहार,
राहों पर आड़ा-तिरछा चल
उन शिखरों को बताता हूँ
हर परिच्छाई को बड़ा देखता हूँ।
ध्यान जब टूटे
तो सब हराभरा दिखे,
पत्रों की बात हो
दोस्ती में बहाव हो,
आँखों से टपकता प्यार
इसपार भी हो,उसपार भी हो,
संघर्षों के वृक्षों पर
फूल खिल
बसंत को पुकारते रहें।
पहाड़ की भूख
एक अदृश्य भूख है,
जो जीजिविषा को शीतल कर
तपस्वी बन जाती है।
झील से बातें करना
वृक्षों के लिए गुनगुनाना,
देवी-देवताओं को आवेदन देना
पुरानी बातों की जड़ ढूंढना,
अनन्त को सजीव करना
हमारे अमरत्व के प्रमाण हैं।
प्यार के प्रखर प्रहरों को
आता-जाता देख,
सोचता हूँ, आधुनिक मौजमस्ती में
नैनीताल को हारना नहीं चाहिए।
** महेश रौतेला