ख्वाहिशों के बोझ तले मैं दबा जा रहा हूं,
मैं अपने ही सागर में डूबा जा रहा हूं,
छोड़कर चंद खुशियां भरी वादियों को,
मैं अपने ही टूटे मकां में घर बनाए जा रहा हूं।
निकला था सफर में कुछ बेनाम रिश्ते लिए,
अब हार कर मैं खुद से ही रिश्ते निभाएं जा रहा हूं।
देखे है कई चेहरे आईने में अपने,
खैर! अभी तो और नए चेहरे बनाते जा रहा हूं।