नैनीताल ( एक लघुकथा)-२
जमाना हो गया है
प्यार में बैठे हुये,
इस बीच क्रोध से मिलना हुआ
राग-द्वेष से भेंट हुयी,
अन्तहीन बातें हुयी
इतिहास से सामना हुआ
वीरों का गुणगान सुना,
ध्यान में हूँ
नैनी झील से बात कर रहा हूँ
झील के किनारे नगर है
तुम तक पहुँचने में समय था
हालांकि छाया आधे मैदान को घेर चुकी थी
मैदान में खेल चल रहा था
कौन हारेगा कौन जीतेगा
इससे मुझे लेनादेना नहीं था,
गीता पढ़ी
जय-पराजय,लाभ-हानि समान समझने का पाठ पढ़ा
हाँल में सनेमा चल रहा था
गुरुद्वारे के आगे भीड़ थी,
बैंड बजने की तैयारी थी
मैं छाया - धूप में खिसकते खिसकते
बड़े बाजार में आ गया हूँ,
जीवन कुछ स्नेह का
कुछ क्रोध का, कुछ राग-द्वेष का
कुछ खेत का, कुछ बाजार का
कुछ लड़ाई-झगड़ों का।
समुद्र मंथन सा कुछ हुआ
रत्न निकले
विष निकला
अमृत भी निकला
और सब संसार में रह गया।
पहिचान में आये
नैना चोटी,इधर-उधर की चोटियां
रास्ते, रास्तों में खिली दोस्ती
मैंने जाना
रास्ते लौटने के लिए होते हैं,
मेरे बगल में बैठे तुम
फूलों से लदे
मानो फल देने वाले वृक्ष थे,
फिर दिन ढले
और चहल-पहल में डूबा शहर।
** महेश रौतेला