मैं हररोज सफाई करता हुँ पर मैं सफाई कामदार नहीं l
मैं हररोज कुत्ते को रोटी डालता हुँ पर मैं पशुपालक नहीं ll
मैं खुद पढता हुँ बच्चोंको भी पढ़ाता हुँ पर मैं मास्तर नहीं l
'गीता' का श्लोक कंठस्थ करता हुँ पर मै ब्राह्मण नहीं ll
मैं खेतो में हल चलाता हुँ बोता भी हुँ पर मैं किसान नहीं ll
दुनियावालों समझलो संभलकर मैं नहीं करता तो करता कोई नहीं ll
- सवदानजी मकवाणा "वात्सल्य"