विषय : कुछ भी तो नाता नहीं।
यूं तो तुम्हारा हमसे और हमसे तुम्हारा कुछ भी तो नाता नहीं।
क्यों तुम मेरे मौन को समझते हो, क्यों तुम मेरी बातो को इतना गौर से सुनते हो तो ....
कभी मेरी लिखी बातो को इतना ध्यान से पढ लेते हो।
और इसी लिए तो कहती हु में की.....
यूं तो तुम्हारा हमसे और हमसे तुम्हारा कुछ भी तो नाता नहीं।
कभी लगता है तुम क्या मेरे अपने हो?
ये सवाल करना भी तो अर्थहीन है।
क्या ये जो लगाव है वो एक छलावा है।
ये कहलवाना क्या सही है? अब थक सी गई हु में।
तो फिर क्या ही समजू में की...
यूं तो तुम्हारा हमसे और हमसे तुम्हारा कुछ भी तो नाता नहीं।
पर लगता है फिर भी कुछ तो है पिछले जन्म का बाकी लेन देन।
एक ऐसा लगाव की जो शब्दों में बया ना हो सके।
ना पाने की कोई शर्त ना खोने का कोई डर ।
एक ऐसा जोड़ जो तोड़ना चाहे तो भी टूटता ही नहीं।
और इसी लिए तो कहती हु में की
यूं तो तुम्हारा हमसे और हमसे तुम्हारा कुछ भी तो नाता नहीं।