विचलित मन तलाशता रहा है तुम्हे !
तुममे खुद को |
तुम देख सकते हो मुझे ,मेरे अंतर को,
मेरे कल ,मेरे आज को | तुम्हारी मेरी कोई
बराबरी नही , मुझपर जो संशय का मल है
वह परिस्थिति, परिवेश , परिवार,समाज, संसार
से पोषित जीवन परिणाम है | कैसे संभव है स्वार्थी
संसार मे निश्वार्थ प्रेम विश्वास | भूली हूँ जहाँ अपना
परिचय मै खुद , तुम्हे कैसे पहचानूँगी भला ?
विश्वास की दुहाई पर क्या मुझे ही
रखा है पलड़े पर ?
एक तरफ खाली ?
तुम्हारे लिए कोई नियम नही?
प्रेम तो समानता देता है न? फिर मै
अकेली ही क्यूँ तुलूँ हाँ !
तुम ऊपर हो सकते हो सामर्थ्य, शक्ति ,
और वजन में मगर!
क्यों भूले कि तुमने ही मुझे प्रेम के
आसन पर बिठाकर,
मुझे अर्द्धांग बनाकर,
समानता तो तुमने ही दी
थी मुझे ?
फिर यह भेद क्यों ?
एक तरफ तुम मुझे जानते हो |
एक तरफ मै खुद को भूली हूँ ,
संशय को परिणाम बनाया है तुमने,
दूरी का | क्या नियंता को शोभित है ,
क्या तुम्हे मेरे अंत: की उठती, लहरती
वेदना का अंदाजा नही |
क्रमशः (अंश से)