क्या मिला ?
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तुम !
अपने तेवर ही पुचकारती रहीं
ताउम्र ---
घटाटोप सन्नाटे में
बुनती रहीं नरम स्वेटर
उजाले का कोई प्रयत्न न कर
अँधेरे में खड़ी घूरती रहीं
उजले सपनों को
बिना प्रयास
करती रहीं जद्दोजहद
अपेक्षा के द्वार खोल
करती रहीं उपेक्षा
जैसे-- सारी दुनिया का बोझ ढो रही हो
कुछ इस अंदाज़ में --
संबंधों की नरम हथेली पर
बोतीं रहीं स्वार्थों के बीज
बेशक ! बेशक !
तुमने पा लिए हैं पँख
उड़ रही हो
लेकिन --देखो,सोचो,गुनो
क्या भीतर की दीवार लाँघ
भीषण युद्ध को विराम दे पाईं ?
सूरज जला देता है
तो ज़रुरत से ज़्यादा बारिश भी
गला देती है पौधों को ---
नहीं पहचान पाईं तुम
उस संतुलन को ----
जो ज़रूरी था
संबंधों की हथेली पर बोए बीजों के
अंकुरण के ,पुष्पित -पल्ल्वित होने के लिए ---!!
प्रणव भारती