कुछ बचा कहाँ है
सबकुछ कह
चुकी हूँ |
जहाँ थे वहीं हो ,
मै ही नही यहाँ पर हूँ |
तुमसे आगे
और तुम्हारे पीछे सोच
ही न पाती ,
तुमसे दूरियों का अहसास ,
मुझे एक पीड़ादायक मृत्यु
की ओर ले जा रहा है |
कह चुकी हूँ मगर !
दीवारो के कान कहाँ होते है,
चीखती रही हूँ,
शायद पहुँचे तुम तक शिकायत
बनकर ,
बस इसी आशा और विश्वास पर ,
गुजरे चलचित्र , जीवन की हल्की
रेखा खींच जाते है , और
इतंजार की थपकी कल सुबह का
जिक्र छेड़ जाती है |