.....मुझे ऐसा लगता है ,
यह सब मेरी चढ़ती -उतरती,
गिरती पड़ती भावना की परख हो |
या कभी ऐसा भी लगला है ,
यह सब मेरे अवचेतन मन मे
उपजे भय का आकार ले लेना |
कभी-कभी ऐसा लगता है ,
कि मेरे ही द्वारा बनाये अवचेतन भय
के पाश मे मेरा मन बँधा जा रहा है,
यही है जो मुझे अशान्त कर पीड़ा दे
रहा है | नही जानती क्यों
मुझे ऐसा लगता है |
मुझे ऐसा लगता है कि मुझे प्रेम
अपनी ओर खींच रहा है ,
उतनी ही तेजी से जितनी तेजी से ,
यह दृश्यगत भय ....क्रमश: