मेरा बदलाव मेरी समाप्ति हो शायद ! ,
मुझमे कुछ न होना ही मेरा बदलाव हो शायद ! |
है बैठा कोई अन्तर जो बदलना नही चाहता ,
चाहता है शायद उस हिस्से को जीना ,
जीवन को समझना , आखिर ! अस्तित्व
से अस्तित्वहीनता , अस्तित्वहीनता से
अस्तित्व क्यों धरा गया | क्यों अशान्ति की
तरफ भागने लगा है मन , जो शायद ! शान्ति
की राह पर चल पड़ा था | कब शान्त होगी यह
अन्तर की उथल -पुथल |
आत्मविवाद