कुछ तो है
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इस होने न होने के बीच
कुछ तो है जो होता रहता है घटित
मन की संकरी गली में
जो बाँधता है एक संवाद सा
जो तोड़ता है एक आभास सा
जो छूता है एक आस सा
सामने, पत्ते पर बरसात की
एक नन्ही बूँद सा
करता है आकर्षित...
पलक झपकते ही
टपक जाता है करता रहता है प्रतीक्षा,
दूसरी बूँद की
ये चलता रहता हैअनवरत ....
.कभी चित्र बनकर
कभी मित्र बनकर
कभी हाथ पर अचानकआ बैठे कबूतर सा
जैसे ही चाहती हूँ करना संवाद
वह उड़ जाता है फुर्र से ....
कभी जम जाता है कटोरे में दही सा
छोड़ जाता है खटास.....
दुबारा जमाने के लिए उन लम्हों को
जो दूध से फैल गए हैं भीतर
एक प्रश्न छोड़ जाता है
भीतर का आँगन रह जाता है सीला ही.....
ज़िंदगी की धूप की करता है प्रतीक्षा
जैसे इंतज़ार में टंगी आँखों की पुतलियों में
ठहरा हुआ
बस,वो एक लम्हा
कुछ तो है.... अनुत्तरित!!
डॉ.प्रणव भारती