तुम हृदय भूमि पर सदा रहे,
पर तुम्हे बाँध न पाई हूँ ,
भावों मे मै भी साथ बहूँ आकार साध न पाई हूँ,
की कोशिश , इच्छा थी मन में देखूँ तुमको
इन आँखो से,
पर सफल कभी न हो पाई |
मन मे करने का भार लिए ,
बोझिल कर्मो का साथ लिए,
मन व्यथित एक किरदार लिए|
जैसे कोई बाँधे रस्सी पिंजरे मे रखा है
मुझको,
है नही चाह उसकी कोई , है नही राह उसकी कोई,
जीवन है रूका साँसे चलती |
कुछ है मन मे जाने क्या है ,
क्यों है मन मे जाने क्या है |
नित - नित बढ़ता विस्तार लिए |