धो दूँ उस प्यार को
गंगा जल से,
हिमालय की ठंडी हवा में
उड़ा दूँ,
छाँव में बैठा दूँ युगों तक।
जम चुका जो मन में
उसे जमा रहने दूँ,
जो मिट्टी से लगा है
उसी से चिपका रहने दूँ,
जो पवित्र जगह पर है
उसे पूज्यनीय रहने दूँ,
जो सुगंध बन चुका है
उसे फैलने दूँ,
धो दूँ उस प्यार को
गंगा जल से।
**महेश रौतेला
३०.०६.२०१५