मैंने प्यार से बहुत बार पूछा
कहाँ से चले थे
कहाँ तुम पहुँचे,
कितनी दुआएं ली
कितनी राह देखी,
किसके नमन में
कहाँ हाथ जोड़े,
किस समय से
कहाँ तुम मिले थे,
किस मुहूर्त्त का
कदम बन चले थे,
दियों को जलाने
बहुत दूर गये थे,
अन्तिम दिनों तक
अमरता लिये थे।
तुम्हारी आँखें जब भी खुली
उजाले बाहर बहुत बार देखे ।
* महेश रौतेला
२०.०६.२०१४