रामायण भाग - 15
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शबरी की भक्ति (दोहा - छंद)
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राम नाम भजती रहे, करती रहती काम।
राम दर्श की आस हैं ,सबरी इसका नाम।।
चुन चुन कालियां ला रही, सजाती राह रोज।
जाने कब प्रभु आ मिले, करते करते खोज।।
प्रभु आए जब द्वार पर, सबरी हुई निहाल।
नयनों से आंसू बहे, पूछो ना फिर हाल।।
राम चरण में नमन कर, पाया शुभ आशीष।
प्रभु सेवा में सदा , झुका रहे ये शीश।।
चख चख बेर खिला रही,ले कर प्रभु का नाम।
बड़े चाव से खा रहे, ममता विवश राम।।
ऐसे मीठे तो कभी ,नहीं महल के आम।
प्रेम मगन प्रभु खा रहे, बिन पैसे बिन दाम।।
Uma Vaishnav
मौलिक और स्वरचित