रामायण भाग - 5
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राज - तिलक (दोहा - छंद)
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बारह वर्षों की घड़ी, बीती सुख के साथ।
गुरु वसिष्ठ जी ने कहा, राज करो रघुनाथ।।
सुनी बात गुरुदेव की, हर्षाए सब लोग।
दशरथ जी ने तब कहा ,देखो शुभ संजोग।।
राज तिलक हो राम का, बोले दशरथ राज।
अवधपुरी में धूम मची, पूरे होगे काज।।
कुटिल मंथरा आ गई , छोडे सारे काज।
कैकयी को सिखा दिया,मिले भरत को राज।।
कैकयी ने मांग लिये , अपने वर दो खास।
राज़ भरत को दीजिए, राम करे वनवास।।
दशरथ ने जब ये सुना , दिल को लागा घात।
सुन रानी अब मान जा , करले सीधी बात।।
Uma vaishnav
मौलिक और स्वरचित