हर पहाड़ से तुम्हें देखता हूँ
हर मोड़ पर तुम्हें ढूँढ़ता हूँ
तुम्हारी बातें दोहरा लिया हूँ
तुम्हारी हँसी हँसता रहा हूँ ,
मुस्कान तुम्हारी चुरा लिया हूँ।
दौड़ता हूँ तुम्हारे लिए मैं
भागता हूँ तुम तक पहुँचने
कहानी कहता हूँ तुम्हीं से सारी
शब्द चुनता हूँ तुम्हारे कहे से
शब्द छाँटता हूँ तुम्हारे लिए सब।
नदी -झील पर जब भी गया हूँ
तुम्हारी सूरत उनमें ढूँढ़ता हूँ,
बादलों को गुजरते जब देखता हूँ
सुहावने सफर का मुसाफिर लगा हूँ।
मन के किनारे जब भी दिखे हो
आँखों में गहरे, मैं झाँकने लगा हूँ
तुम्हारा दिया पकड़े हुए हूँ
स्वयं की छटा खोने लगा हूँ,
खुशबू वहीं पड़ी हुई है
जहाँ क्षणों से क्षणों तक खड़ा रहा हूँ।
#महेश रौतेला
२९.०५.२०१५