"कब थे"
आवाज़ के सहारे हम कब थे ?
लब्ज़ आंखों के इशारे कब थे।
देखा चारों तरफ सहारे के लिए,
पंजा खुर्शिद के सहारे कब थे।
हाथ आफ़ताब पिघला कर बैठे,
धूप में वाकिए लिखे कब थे ।
आसरे जाते रहे आस है बाकी,
तूफ़ान बांहे फैला किनारे कब थे।
भोर फूटते ही डूबते हुए तारें देखे,
फलक से चांद सितारे उतारे कब थे।
नीले पीले ये लम्हे जागीर है मेरी,
सहारे जिंदगी हम बे-सहारा कब थे।
~ *बिजल जगड़*