पथदर्शक...
उस सूरजकी किरणे
दिनके उजालेकी और..
और..
रातका तारा ध्रव..
उसीकी भाती था
पथदर्शक जैसे
आगेका रास्ता ...
अंजान था नगर
रूषिका सफर चलना
चलते ही रहना
बहना और बहते ही रहनां
उस पार से ईस पार तक
पथदर्शक रहा
अपना ना सही
अपना रहा..
समजने की थी दुनिया
समजा रहा..
फासला तय हुवा चट्टानोमे
पथरिले पहाड में पनाह लेता
पवन और मेरी सांसे
रातमे ईन्तजार करती
सूरजका और लाखो सितारे!
समजमे नहीं आ रहे थे!
पथदर्शक जरा आगेका सोच
बादल बढते बारिस की सोच
तूफान थी नदी और
झरनेकी मोच..
उफ..!
आँधी और बारिशका मौसम
बनता-बिगडतां
रास्ता बेहता जा रहा था
बिच-बिच मे गा रहा था
मुसाफीर फीर भी आ रहा था
पथदर्शके सहारे
हर दिन सूरजको वारे
रात के ध्रुव के तारे
उजाला अंधेरे को ओर जैसे
करिब से देखता हुवा...
गुजरता वक्त था
"साथ"-साथ मे सख्त था
पथ-पथिक का दर्शक जैसे
संत था!
सतर्क जैसे
पथदर्षक परमेश्वर
अंजान नगरमे अकेली आत्मा
ऐक परमात्मा....
पथदर्शक...
जाग्रुति मारु "जागु"