लड़ झगड़ के फिर मिल जाते
वो बचपन के मेल सही थे।
न था पब्जी ना फोन
गिल्ली डंडे के वो खेल सही थे।
साइकिल थी सब की प्यारी सवारी
हम बच्चों की रेल सही थी।
न कोई झंझट न कोई चिंता।
पास से ज्यादा फेल सही थे।
पंख लगा के उड़ गया बचपन
भौतिकता हो गयी भारी हम पर
दिन भर भागते दौड़ते रहते
सिर पर आ गयी जिम्मेदारी हम पर।
खेल छूट गए वो गिल्ली डंडे के
पब्जी हो गया भारी हम पर।
फाइलों के बीच खो गया सुख चैन
रुपिया हो गया भारी हम पर।
चालीस पर भी न घर द्वार बसा ।
गुस्सा हो जाती महतारी हम पर।
बीयर से रोटी खाते हैं
कोका कोला अब फलहारी हम पर