ओ बया, कितना सुंदर होता
अगर तुम एक कहानी बुनकर
थमा देती कबूतर को
फ़िर प्रेम का वो पंछी
उसे सौंप देता किसी चील को ले जाकर
ले उड़ती फिर चील उसे
अपने पंजो में दबाकर
ऊँचे आसमान में
और उसके टुकड़े करके
बिखेर देती हंसों के डैनों पर
हंस उसे ले जाते
सात समंदर पार
और इस कदर
बरकरार रहता हमारा प्यार।
हे नीलकंठ
क्या यह मुमकिन है
कि तुम पी जाओ कोई प्रेमकथा
और उगल दो उसे
किसी घर की मुँडेर पे
जहाँ से चुग ले उसे
कोई नटखट गौरैया
और उन टुकड़ों से बना दे
घोंसला,
किसी वधिक के द्वार
और इस कदर
बरकरार रहता हमारा प्यार।
ऐ पपीहे,
किसी प्रेमिका की आँखों से नमी पी ले
और पिरोकर अपने सुरों में
गाया कर
सावन की बरसती हुई रात में,
ताकि प्रेम की लड़ियाँ
घुल जायें फ़िज़ा में
और कोई सोन चिरैया
चुग ले उन्हें
परागकणों की तरह
ताकि धरती की गोद से
हरियाली के वेश में
प्रेम फूटे बारम्बार
और इस कदर
बरकरार रहता हमारा प्यार।
-सत्यदीप त्रिवेदी