खुद को जान के पन्नों में उतार लू ,
मैं भी अपनी हस्ती थोड़ी सी निखार लूं |
फितरत वैसे तो मेरी बहुत ही सरल है,
इनमें भी में थोड़ी गहराई ताक लूं |
शब्दों से खेलना जिंदगी है मेरी ,
भाषा सजीली उसमे कोई उतार लूं |
खेल अनूठे बहुत खेले और देखे,
फूरसद मिले जो उसको फिरसे निहार लुं|
चंद लम्होंमें समाई जिंदगी को,
भरके आँखो में फिरसे दीदार लूं|
-डॉ.सरिता (जलधि)