प्रेम नहीं मानता
समाज के नियमों को
वो तो है समस्त बन्धनों से परे
नहीं समझता इंसानी भाषा को
वो तो पढ़ता है केवल
साँसों के उतार-चढ़ाव को
बदन की हरारत को
लबों की जुम्बिश को
वो तो जीता है केवल
प्रेम में ली गयी कसमों में
प्रियतम से किये गए वादों में
मिलन के पलों की यादों में
प्रेम नहीं मानता......।
-मधुमयी