तुम आकर देख लो
सब कुछ बेतरतीब है
एक तुम्हारे जाने से..
कमरे की दीवारें पूछ रहीं हैं
तुम्हारे बारे में ,जिनपर ....
नाम लिखती हूँ तुम्हारा
जिन क़िताबों में तुम्हारा दिया
गुलाब छुपाती थी अक्सर..
उनके सफ़हे उदास हैं तुम बिन
नज़्म ठंडी पड़ चुकी है और
शायरी ख़ामोश है,
स्याही बर्फ़-सी जम चुकी है
अल्फ़ाज़ पत्थर हो गए हैं..
एक बार आ जाओ न !..तो ज़र्रे-ज़र्रे में
जान पड़ जाए......।
-मधुमयी