मेरे अन्दर एक घर है
जहाँ तुम आ सकते हो,
उसकी खिड़की-दरवाजे खोल सकते हो,
एक वृक्ष है
जिसे तुम काट नहीं सकते हो,
एक पहाड़ है
जिसमें चढ़ नहीं सकते हो,
लम्बी राह है
जहाँ तुम भटक सकते हो,
एक देश है
जहाँ सम्पूर्ण हो सकते हो,
विशाल विश्व है
जहाँ मनुष्य होने का एहसास पा सकते हो।
* महेश रौतेला