सुन मुनिया....
हम थे पागल; सबको समझते थे अपना;
पर था वोह तो एक जूठा पर हसीन सपना ।
आंख खुली तो समझ आया कि सपने अक्सर टूट जाते हैं
आंखे खुलते ही, कठोर सच्चाई दिखा जाते हैं ।
भुल गए थे हम की दुनिया चलती है पैसों के जोर से;
मिलती है बेरुखी और धोका अक्सर अपनो की ओर से ।
रुतबा हो, पैसा हो, शान हो तो कुत्ते की तरह पूंछ हिलाती है दुनिया;
यह ही कठोर सच्चाई है, याद रखना तु, मेरी मुनिया ।
Armin Dutia Motashaw