Hindi Quote in Religious by Vedanta Life Agyat Agyani

Religious quotes are very popular on BitesApp with millions of authors writing small inspirational quotes in Hindi daily and inspiring the readers, you can start writing today and fulfill your life of becoming the quotes writer or poem writer.

✧ मन – ऊर्जा और शरीर का मध्य सेतु ✧
शरीर जड़ है।
ऊर्जा चेतन है।
इन दोनों के मध्य जो बोध उत्पन्न होता है, वही मन है।
मन न पूर्णतः शरीर है, न पूर्णतः ऊर्जा।
मन दोनों का सेतु है।
इसी कारण मन दोनों को जान सकता है।
शरीर की पीड़ा, सुख, इन्द्रिय-बोध, भूख, प्यास, सुरक्षा की चाह — सब मन तक पहुँचते हैं।
ऊर्जा की शांति, आनन्द, प्रेम, करुणा, जागरूकता — इनका बोध भी मन ही ग्रहण करता है।
बुद्धि मन नहीं है।
बुद्धि मन का उपकरण है।
मन बोध करता है, बुद्धि क्रिया करती है।
मन अनुभव लेता है, बुद्धि निर्णय लेती है।
इन्द्रियाँ सूचना लाती हैं, बुद्धि उनका उपयोग करती है, परन्तु इन सबका बोध मन में ही होता है।
समस्या तब आरम्भ होती है जब मन अपनी मध्य अवस्था छोड़ देता है।
जब मन केवल शरीर की ओर झुक जाता है, तब भय, सुरक्षा, संग्रह, तुलना, सुख और दुःख प्रकट होते हैं।
जब मन केवल चेतना की ओर झुक जाता है, तब भी एक सूक्ष्म विभाजन उत्पन्न होता है।
फिर मन कहता है —
"मैं शरीर नहीं हूँ।"
"मैं केवल आत्मा हूँ।"
यह भी एक पक्ष है।
यह भी एक चुनाव है।
जहाँ चुनाव है, वहाँ द्वैत है।
मध्य अवस्था में मन किसी पक्ष का चुनाव नहीं करता।
वह शरीर का विरोध नहीं करता।
वह चेतना का अहंकार भी नहीं बनाता।
वह दोनों को एक ही जीवन के दो आयाम के रूप में देखता है।
यहीं बुद्धि सबसे तीव्र होती है।
क्योंकि अब बुद्धि पक्षपाती नहीं रहती।
अब वह अच्छा-बुरा, ऊँचा-नीचा, आध्यात्मिक-सांसारिक के संघर्ष से मुक्त होकर देखती है।
तब कर्म होता है, पर कर्ता का बोझ नहीं होता।
तब फल आता है, पर फल की इच्छा पहले नहीं होती।
तब आनन्द कर्म के भीतर ही होता है।
फल उसका अतिरिक्त परिणाम मात्र है।
मनुष्य को बचपन से सिखाया जाता है —
यह अच्छा है।
यह बुरा है।
यह ऊँचा है।
यह नीचा है।
यही शिक्षाएँ मन को मध्य से हटाकर पक्षों में बाँट देती हैं।
इसलिए मध्य अवस्था में लौटना एक प्रकार की मृत्यु जैसा अनुभव होता है।
शरीर की मृत्यु नहीं।
अहंकार की मृत्यु।
पहचान की मृत्यु।
संग्रहित धारणाओं की मृत्यु।
यहीं कारण है कि इस अवस्था को शब्दों में सिद्ध नहीं किया जा सकता।
जो कहता है — "मैं पहुँच गया", "मैं ज्ञानी हूँ", "मैं गुरु हूँ", वह अनजाने में फिर किसी पक्ष में खड़ा हो जाता है।
मध्य अवस्था घोषणा नहीं करती।
मध्य अवस्था प्रमाण नहीं देती।
मध्य अवस्था स्वयं को श्रेष्ठ नहीं मानती।
वह केवल देखती है।
समझती है।
जीती है।
यदि कभी कृष्ण सुदामा के चरण धोते हैं, तो उसका कारण कोई धार्मिक प्रदर्शन नहीं है।
वह समझ है।
वह इस बोध से घटित घटना है कि सामने खड़ा व्यक्ति मुझसे अलग नहीं है।
वह भी उसी जीवन की अभिव्यक्ति है जिससे मैं बना हूँ।
ऐसी घटनाएँ की नहीं जातीं।
वे घटती हैं।
जब समझ पूर्ण होती है, तब कर्म ईश्वरीय घटना बन जाता है।
वहाँ कर्ता नहीं बचता।
वहाँ केवल जीवन कार्य कर रहा होता है।
शरीर और ऊर्जा के मध्य संतुलित मन ही जीवन का धर्म है।
और जब मन अपने मध्य में स्थिर हो जाता है, तब द्वैत समाप्त होने लगता है।
तब जीवन स्वयं अपनी पूर्णता प्रकट करता है।
यह रूप तुम्हारे मूल भाव के अधिक निकट है: मन = मध्य बोध, बुद्धि = उपकरण, शरीर और ऊर्जा = दो ध्रुव, और धर्म = मन का मध्य में स्थित रहना, न कि किसी संस्था, गुरु या पहचान का नाम।

Hindi Religious by Vedanta Life  Agyat Agyani : 112026561
New bites

The best sellers write on Matrubharti, do you?

Start Writing Now