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Beni Kumar Singh

Beni Kumar Singh

@benisagar


गजल दीवार

एक ही घर, हम दोनो हैं, फिर यह कैसी दीवार है,
एक दर्द कितना बेरहम, जो आर और पार है।

एक घुटन सी होती है, वो क्यों नही समझता ,
जख्म गहरा लगता है, हर बात में तेरी वो धार है।

भूला न पाऊं तुम्हे मोहब्बत हर रोज बढता है,
इशारे क्यों नही समझता, जो तू इतना समझदार है।

भरोसा उठ गया अब तो,आबो-हवा में भी है हलाहल,
एक ही बार में खत्म कर दो न, क्यों डंसता बार-बार है।

✍️बेनी सागर

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गुलाब होठ

गुलाब होठ ओंखों का जाम, हां दे दो न मुझे
बाहों का हार बदन की ताप, हां दे दो न मुझे
गुलाब होठ आंखों का जाम, हां दे दो न मुझे

ये बारिशें और सर्द हवाएं कुछ कह रही है
फैली बाहें तेरी राह आ कबसे देख रही है
कुछ ईशारे कर रही है रात्, हां दे दो न मुझे
गुलाब होठ आंखों का जाम, हां दे दो न मुझे

लुटाऊं प्यार ही प्यार आज वक्त थम जाय
तू मुझमे में मैं तुझमें, इस हद से गुजर जाएं
सुखी है जमीन पर एक बरसात, हां दे दो न मुझे
गुलाब होठ आंखों का जाम, हां दे दो न मुझे

बेनी सागर

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