मैं और मेरे अह्सास
संगदिल
में कहां कभी किसीका एहसान रखता हूँ l
बात सीधी लगती है पर सच्ची कहता हूँ ll
बेपनाह बेहिसाब इश्क़ हो गया कब से l
संगदिल सनम से मोहब्बत करता हूँ ll
में एक तरफ़ा प्यार युगों युगों करके l
रोज सुबह शाम ठंडी आहे भरता हूँ ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह