संकल्पोत्सव...
हार से टकराकर में अब हार न लिखुं,
जितने का एक संकल्प दीवार पर लिखुं।
जीत लु खुशियां अपार सबके लिए,
मन में सबके लिए मै संकल्प अपार लिखुं।
छोड़कर चलु बुराइयों के बादलों को,
अच्छाई अपनानेके संकल्प हर बार लिखुं।
दर्द , तड़प, आसूं जीवनका न हिस्सा हो,
खुशी,महक,मस्तीके किस्से हजार लिखुं।
खुश खुशियोंको करदु, एक ऐसा संकल्प लु,
दुख: को मारदु, मै खुशियोंकी बहार लिखुं।
विश्व कल्याणकी चाहत मनमें हो 'राज'
एक संकल्प ऐसाभी कि मै प्यार से प्यार लिखुं।
देह को पाकर जी मेने जिंदगी खूबसूरती से,
क्यों न काम आए किसी और के ऐसे एक संकल्प से।
भरत (राज)