"थकान के अरमान"
थकान के अरमान ऐसे
कि चाय हो बेवक्त की
हो घूंट-घूंट आरामदेह व
खबर दे हर सख्श की।
चिड़चिड़े हों पैर गर
डूबे रहें एक पात्र में,
झुरझुरी दे शीत जल
अशांति बैठे त्रास में।
सुकून बन चिलमन खड़ा
हो आड़ में बैठे रहें,
शांति की आगोश में
हम ऑंख मूंद लेटे रहें।
- मुक्ता प्रियदर्शनी