रिश्ते-नाते
होते हैं निभाने को
सुख-दुख बांटने को
हंसने को
गुदगुदाने को
उत्सव मनाने को
कभी असहाय हो तो
देने को थोड़ा सहारा
आंखों की चमक लौटाने को
होते हैं रिश्ते-नाते
पुराने ज़ख्म पर मरहम लगाने को
होते हैं रिश्ते-नाते
मगर अफ़सोस है ऐसा नहीं हुआ
नहीं मिला कभी सुकून
न गिरती पगडंडी पर सहारा
न उकसाया किसी ने
कि उठों और फतह करो
रिश्ते-नाते
बड़े दिनों के बाद मिलते हैं
बहुत ढूंढने पर
इतने दिनों की कोशिश
उम्मीद की घड़ी रोक देती हैं
वे सिखा देते हैं कि
ज़िंदगी क्या है?
वे सब कुछ जता देते हैं
बातों-बातों में
कि तुम्हारा, तुम्हारे सिवा कोई नहीं है।
रिश्ते-नाते
आशा की अधबनी दीवार
गिरा देते हैं
बनाने के बजाय
रिश्ते-नाते
अब नहीं होते इकठ्ठे
किसी भी सुख में
दुख में
बहुत दूर से निभाने होते हैं
रिश्ते-नाते
नजदीकियां अक्सर
सात पीढ़ियों से बना हुआ रिश्ता
तोड़ देती हैं।
ऐसे ही होते हैं
रिश्ते-नाते
© saras Kumar