ये शायद भी कितना हसीन ख़्वाब है ना,
हक़ीक़त से दूर, ख़्वाबों में ले जाता है।
असलियत में जो रह गईं अधूरी चाहतें ,
उन्हें ये अपनी दुनिया में पूरी करवाता है।
कैसे?
जहां हम हर उस बंधन से आज़ाद होते हैं,
जिनसे हम असल में होना चाहते हैं।
और
हर उस बंधन में बंधे हुए होते हैं,
जिनमें हम बंधना चाहते हैं।
शायद!
इस दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत शब्द है।
जिसे बोलने मात्र से हम कल्पनाओं
की ऐसी उड़ान भरने लगते हैं,
जो हमारे मन से भी तेज़ दौड़ती हैं
और पहुंच जाती हैं ,
वहां, उस जगह, उसके पास!
जहां, जिस जगह, जिसके पास,
हम हक़ीक़त में जा नहीं पाते।
जिसके हम चाह कर भी हो नहीं पाते।
शायद!
वो वैसा नहीं था
जैसा मेरे साथ रहा!
उसकी कोई मजबूरी रही होगी!
जादुई है ना ये शब्द!
जिसके इस्तेमाल करने भर से ही
हम बुरे से बुरे इंसान को
अच्छा समझने की क्षमता पा लेते हैं।
शायद! ( हो सकता है!)
थोड़ी जल्दी निकलती तो उसे देख पाती!
उससे मिल पाती!
उससे बात कर पाती!
हुई न दिलकशी इस अल्फाज़ से!
अधूरे जज़्बातों को पूरा करने की
ताकत रखता है ये शब्द।
शायद! ( हो सकता है!)
वो आज भी ज़िंदा होता
अगर वो बीमारी ना हुई होती!
परिवार पूरा होता,
अगर अकस्मत उसकी मौत ना हुई होती!
जिसे हम हमेशा के लिए खो चुके होते हैं
उनके संग भी ज़िंदगी जीने का मौका देता है।
करता है ना आकर्षित ये शब्द अपनी ओर!
शायद ( हो सकता है!)
वो नौकरी लग गई होती
तो आज बात कुछ और होती
अपना घर होता
अपनी गाड़ी होती!
बाज़ार में बिक रही
हर ख़ुशी खरीद ली
शौक़ भी पूरे हो गए
सिर्फ इस एक शब्द से!
शायद! ( हो सकता है!)
एहतियात बरती होती
तो चोट न लगी होती
अपंग न हुई होती
तो बड़ी कलाकार होती!
किया ना इस शब्द ने कमाल
जो कुशलता नहीं भी सीखी
उसको भी सिखा दिया इसने!
फलस्वरूप सफलता का मीठा
फल भी चखा दिया इसने!
कितना अद्भुत, विस्मयकारी है ना
अपने आप में ये शब्द!
हो सकता है ( शायद! )
भगवान ने आपकी योजना को बर्बाद कर दिया हो!
ऐसा क्यों हुआ कभी सोचा हमने?
ताकि आपकी योजना आपको बर्बाद न कर दे।
किसी को खोना, कोई सपना अधूरा रह जाना
पीड़ादायक है।
शायद!
भगवान ने आपसे वो चीज़ दूर करके
आपको खोने से बचाया है,
दुबारा उसके पास जाके ख़ुद को मत खोइए।
शायद! जो हो रहा सही हो रहा
जो हो गया, सही के लिए हुआ!
शायद!