इस भोर के स्वप्न में जाने कैसी ये आहट है।
उलझूं जब खुद में मेरे मुरशिद का दीदार हो ।।
ख्वाब बेवजह तो नहीं कि कह सकूं सब बेहतर है ।
तू संभाल लेना मुझे कि तुझ पर यकीं खुद से ज्यादा हो।
तेरी नजरों के सामने भरे दरबार का वो मंजर ।
कि तेरे कदमों को चूमकर मेरे रूह में हरारत हो ।।
दुनिया की भीड़ में एक रूहानी दर है तेरा ।
तुझे एकटक देखूं तो मेरे नसीब का जागना हो।।
क्या करम है मेरे मौला जो मुझे महफूज किया तूने।
महसूस करता है दिल मेरा तू मुझमें कतरा कतरा हो ।।
दुनियावी तिलिस्मों में एक रूहानी छाया है ऐसा।
तूं मुझ में रचा बसा है ऐसे जैसे मृग में कस्तूरी हो।।
एक फरियादी बन तुझसे गुजारिश करती है ’गुंजन’।
दुनियावी ख्वाहिशें खत्म हो तेरा दीदार मेरी जन्नत हो ।।
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