कविता :- देवी
तुम ही सूरज कि रोशनी जैसे,
जैसे बादलों मे छुपी चांद कि चांदनी हों ,
जैसे आँगन मे लगी पवित्र तुलसी हों
इस राष्ट्र के सुशासन कि कुर्सी हों ||
जैसे बगीचे मे खिले रंग-बिरंगे फूलों कि "महक" हों...
जैसे मधुर धुन सुनाती कोई चिड़िया कि "चहक" हों
मन भावन प्रिया हों, पिया कि जैसे...
जैसे अँधेरे कि राह मे जलता दीया हों...
कृष्ण के प्रति मीरा का अनुराग हों जैसे...
जैसे...मानो तुम "अलादीन का चिराग" हों,
और कहें तो... भोर कि खिलतीं कली हों
बगीचे मे उलझी हुई लता कि लड़ी हों
कहे तो पालने मे झूलती परी हों...
दो घरों का निस्तार करने वाली...
शुभ चिंतक बनी कोई घड़ी हों...
माँ बाप कि बुढ़ापे मे छड़ी हों...
तुम बहती नदी का शीतल "नीर" हों,
सभ्य समाज कि मर्यादा का "चीर" हों,
हों तुम कान्हा कि राधा सी,
हों तुम राम कि सीता सी,
और कहे तो... हों तुम शिव कि गौरी सी...
माँ कि प्यारी लाली, बाप के कलेज़े कि कोर प्रिये,
और कहे तो मेरी प्यारी-प्यारी अनुजा प्रिय...
हों तुम जग जननी और देवों मे श्रेष्ठ देवी...||
सुनिल सुथार