मुझे लगता था
'छूटना'
सामान्य-सी घटना है जीवन की
पर यह
इतनी भयावह हो सकती है
पहली बार तब जाना
जब आसमान में उड़ते हुए दामन से उनके
छूटा था मेरा हाथ
क्षत-विक्षत
छटपटाता हुआ समय
गुजर गया हमेशा की तरह
पर उनके 'छूटने' का एहसास
कौंधता है जेहन में आज भी
डराता है अब भी
- निर्मल राठौड़