"रूह" का कतरा कतरा जब जख्मी हो गया
शब्दोंका सैलाब भी मौन में बदल गया
कुछ इस तरह जख्मी हुए हम अपनो से
रिसेतेका हर रूप दिलसे उतर गया
गिले-शिकवेका दौर ही ना आया और
अपनो ने अपनोसे मूंह मोड लिया
कैसा ये दौर यूं दर्द ले आया है
पलक झपकते ही वक्त बदल गया
रिस्तोकी चादरमें इतनी सलवटे क्यो है
क्या खूनके रिस्तोमें सिर्फ मतलब ही रह गया?