शुभ संध्याकाल संध्या वंदन बृहस्पतिवार वीरवार गुरुवार सभी विष्णु भक्तों को हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई है ब्रह्मदत्त त्यागी हापुड़ एवं सभी भक्तों की सभी भगवान विष्णु भक्तों को ......... वैसे तो बहुत भक्त इस विषय में जानकार हैं, परन्तु कुछ भक्त आज भी इस विषय में अन्जान हैं हिंदू धर्म में यदि हमने जन्म लिया है तो हिन्दू रिति रिवाज की भी हमको जानकारी होनी चाहिए...........जय श्री भगवान विष्णु नमस्कार स्वीकार करें
ब्रह्मदत्त त्यागी हापुड़ भगवान विष्णु जी से सभी भक्तों के लिए प्रार्थना करता है....... भगवान विष्णु जी के सभी भक्तों का शुभ बृहस्पतिवार वीरवार गुरुवार संध्याकाल में हार्दिक स्वागत एवं अभिनन्दन है,
भगवान विष्णुजी आपको बारंबार प्रणाम नमन नमस्कार है
जय जय नारायण नारायण
हरि हरि तेरी लीला प्रभु
न्यारी न्यारी हरी हरी
" ब्रह्मदत्त त्यागी
'भगवान विष्णु श्री हरि
ब्रह्मदत्त
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
शुभ बृहस्पतिवार वीरवार गुरुवार
ब्रह्मदत्त त्यागी
आरती क्या है? ब्रह्मदत्त
आरती की संपूर्ण जानकारी
प्राप्त करें ➖ब्रह्मदत्त त्यागी हापुड़
श्री गणेशाय नमः ॐ श्री हरि विष्णुदेव आपको बारंबार प्रणाम नमन नमस्कार है आज आपका शुभ दिन बृहस्पतिवार वीरवार गुरुवार है..... संध्याकाल संध्या वंदन भक्तों....... आज जानते हैं आरती की संपूर्ण जानकारी...... ब्रह्मदत्त त्यागी हापुड़
☀️▪️☀️🔱☀️☀️🔱☀️▪️☀️▪️☀️🔱▪️🔱☀️▪️☀️▪️🔱☀️▪️🔱☀️▪️🔱
आरती क्या है और कैसे करनी चाहिये?
आरती को 'आरात्रिक' अथवा 'आरार्तिक' और 'नीराजन' भी
कहते हैं। पूजाके अन्तमें आरती की जाती है। पूजनमें जो त्रुटि रह जाती
है, आरती से उसकी पूर्ति होती है। स्कन्दपुराणमें कहा गया है-
"मन्त्रहीनं क्रियाहीनं यत् कृतं पूजनं हरेः ।
सर्वं सम्पूर्णतामेति कृते नीराजने शिवे ॥"
'पूजन मन्त्रहीन और क्रियाहीन होनेपर भी नीराजन (आरती) कर लेने से उसमें सारी पूर्णता आ जाती है। '
आरती करने का ही नहीं, आरती देखने का भी बड़ा पुण्य लिखा है। हरि भक्ति विलास में एक श्लोक है-
"नीराजनं च यः पश्येद् देवदेवस्य चक्रिणः ।
सप्तजन्मनि विप्रः स्यादन्ते च परमं पदम् ॥"
'जो देवदेव चक्रधारी श्रीविष्णु भगवान्की आरती (सदा) देखता
है, वह सात जन्मोंतक ब्राह्मण होकर अन्तमें परमपदको प्राप्त होता है।'
विष्णुधर्मोत्तरमें आया है-
धूपं चारात्रिकं पश्येत् कराभ्यां च प्रवन्दते ।
कुलकोटिं समुद्धृत्य याति विष्णोः परं पदम् ॥
'जो
धूप और आरतीको देखता है और दोनों हाथोंसे आरती लेता
है, वह करोड़ पीढ़ियोंका उद्धार करता है और भगवान् विष्णुके
परमपदको प्राप्त होता है।'
आरतीमें पहले मूलमन्त्र (जिस देवताका जिस मन्त्रसे पूजन किया
गया हो, उस मन्त्र) के द्वारा तीन बार पुष्पाञ्जलि देनी चाहिये और
ढोल, नगारे, शङ्ख, घड़ियाल आदि महावाद्योंके तथा जय-जयकारके
शब्दके साथ शुभ पात्रमें घृतसे या कपूरसे विषम संख्याकी अनेक
बत्तियाँ जलाकर आरती करनी चाहिये-
- प्रस्तुतिकरण ➖ ब्रह्मदत्त त्यागी हापुड़