वो जो तन्हाइयों का दौर था......
वो जो तन्हाइयों का दौर था, वक्त ही कुछ और था।
न शिकवा था कोई जमाने से
न कोई शिकायत बनाने वाले से
खुद ही मालिक दास स्वयं ही
चलता न किसी का जोर था
वो जो तन्हाइयों का दौर था, वक्त ही कुछ और था।
चलते थे कदम किसी भी ओर
न कोई रोकटोक न कोई विरोध था।
मंजिल के बिना बढ़ते ही जाते थे
जिस भी तरफ सुनता कोई शोर था।
वो जो तन्हाइयों का दौर था, वक्त ही कुछ और था।
न चिंता थी कर्म कमाई की, न परवाह थी रोजी रोटी की
न भय था महल चौबारों का, न लोभ था नोट हजारों का
परछाइयों के संग चले थे कठिनाइयों से नहीं भिड़े थे
तन्हा ही चल पड़ते थे न रात पता न भोर का
वो जो तन्हाइयों का दौर था, वक्त ही कुछ और था।
- चमनलाल भारद्वाज