*व्यंग्यिका*
कुकर्मों का ककहरा जनता खूब जानती है......
सब नेता हो जाए या
बाकी रहेगी कुछ जनता
क्योंकि सामान्य जनता
दुख दर्द के मारे चीखे ,चिल्लाए
इनको तो कोई फर्क ही नहीं पड़ता!
यह पांच साल के लिए
बैठ जाते हैं कुर्सी पर जमकर
डाल लेते हैं कानों में
तेल और रुई भर भर कर।
सुनाई पड़ती है पुकार न चीत्कार देखिए ,इन बहरों के
कैसे कैसे हैं प्रकार
फिर भी येन केन प्रकारेण
जनता के सामने
खींसे निपोर सत्ता हथियाने को
एकदम तैयार।
पता नहीं कौन सी योजनाएं
कहां बनाई जाती हैं
किसके लिए चलाई जाती है!
हकीकत देखो तो आंकड़ों में सब हवा-हवाई नजर आती हैं
करोड़ों के इधर उधर से
इनकी जेबें गर्मायी जाती हैं।
अपनों को बचाने के लिए चालें चलते हैं
पुलिस ,नेता व्यक्तिगत दुश्मनी के लिए नियमों की माला जपतें हैं
और अपराधियों को बचाने को
कानून को ताक पर रखते हैं।
पर्दे के पीछे न जाने
कितनी काली करतूतें करते हैं
पर्दे के सामने सफेद वस्त्र धारण कर अच्छाइयों का दम भरते हैं
चालाकी, बेईमानी और
मक्कारी का खेला रचते हैं।
लोकतंत्र में इनकी कारगुजारी से
लोग तंग हो रहे हैं
पर ये भ्रष्ट खुद को दूध का धुला
साबित करते हुए मगन हो रहे हैं।
इनके कुकर्मों का ककहरा
जनता खूब जानती है
फिर भी मोटा चश्मा लगाकर
इन्हें झूठ का पहाड़ा पढ़ते
शर्म नहीं आती हैं।
कितनी बेदर्दी से निर्दोषों के मर्डर को आत्महत्याओं का रंग दे दिया जाता है
अपने काले कारनामों को
झूठ से ढ़क दिया जाता है।
इन सफेदपोशों को सही रास्ते
पर आना होगा
नहीं समझे तो जनता को
नोटा दिखाना होगा।
@अनुपमा अनुश्री