हम बेबाकी से पन्ने पलटते रहे,
कोइ पुराने ज़ख्म थे जो खुरेदते रहे...
एहसास ,हक ,वक्त सब तो दिया था,
फ़िर भी हर बार क्यो...
हर बार क्यों..?
गुमनामियाँ ,परेशानिया, बर्बादीयाँ देते रहे...
माना इस खातावही मे सबसे उपर मेरा नाम नहि ,
फ़िर भी
मेरे जमा किए प्यार, अपनेपन, के सामने
दर्द क्यो न्यॉछावर करते रहे..