मेरा जीवन है कम तू संसार है,
नभ तक फैला हुआ तेरा प्यार है
मैं तुझमें समाहित इक पत्थर हूं
उस पत्थर में तरासा तू भगवान है।
तू शिव या तुलसी की कोई डाल है,
तेरा रूप भी कितना विशाल हैं।
इक कड़ से तू कब विश्व बने
इस लीला से सभी अनजान है।
तू है दुर्गा या ममता का रूप है,
तेरी ज्योति से ही होती धूप है
फिर मन का ये कैसा अंधकार है
मेरा जीवन में एसा धिक्कार है।
तू यशोदा का लाल है
जो पहनाता फिरता बरमाल है
तेरी चाहत में मै कैसे जोगन बनू,
वरमाला पर मेरा भी अधिकार है।
तूने उपदेश गीता में जितने दिए हैं,
उसमे से क्या स्मरण तुझे एक है,
भक्ती के बदले जो मुक्ती मिले
वहीं ईस्ट श्रेष्ठी में श्रेष्ठ हैं।
कितने रूप में सबका उद्धार किया है
मेरी बारी पर आखिर क्यो इंकार किया है
मैं थोड़ी सी बिगड़ी हुई हूं मगर थोड़ी भली हूं
प्रेम को जुनू आजीवन हर छड़ छड़ जिया है।