हे महादानी, हे वीरो के वीर, हे अंगराज,
में श्री कृष्ण बताता हु तुम्हारा एक राज।
समर मैदान में तुम किसके साथे लड़ोगे,
क्या तुम अपने ही भाईके हत्यारे बनोगे?
यह सुन कर कर्ण पूरा कंपित हो गया,
बदले का लावा जैसे दिल मे सो गया।।
विचलित हो गया कर्ण, यह बात जब सुनी,
वो था एक सच्चा मित्र, लड़ाई उसने चुनी।।
क्या अधर्म था मेरा की मुजे बहा दिया,
तुमने यह कह कर मुजे यह रुला दिया।।
सूत पुत्र कहकर मुजे यहां धिक्कारा था,
भरी सभा मे अपमानों का तीर मारा था।।
भले ही पांच महावीर मेरे अनुज भ्राता है,
पर गर्व से कहता हूं सिर्फ राधे मेरी माता है।।
हे कर्ण, अधर्म के अंधकार में कोई नही रहते,
हो रहा था अपमान द्रोपदी का तुम कैसे सहते।।
केशव, में ऋणी हु दुर्योधन का, वो नही भूलूंगा,
धर्म और मित्रता में, में केवल मित्रता हु चुनुगा।।
राधे पुत्र, में तुम्हारे चरणों मे सब बिच्छा दूंगा,
पूरी मानवजाति को आपके आगे जुका दूंगा।।
भीम छाता लेकर खड़े होंगे, अर्जुन सारथी होंगे,
आगे आप होंगे, पीछे जगत के महारथी होंगे।।
कृष्ण बात सही पर, ऋण का यह मोल नही है,
दिया है वचन दुर्योधन को उसका तोल नही है।।
जो हो गया विचलित तो इतिहास धिक्कारेगा,
सिर्फ वो मेरे नाम सुनते ही, मुजे चाट्टे मरेगा।।
मुजे पता है, समर में क्या परिणाम आएगा,
कुरुक्षेत्र का मैदान कितनी लाशें उठायेगा।।
पर में कायर नही, मौत के मंजर से डर जाऊ,
सामने हो कृष्ण तो आपके सामने लड़ जाऊ।।
धन्य है कुंते आप, धन्य आपकी यह खुमारी है,
जिसको आपने संस्कार दिया वो महान नारी है।।
हो रहा था युद्ध भीषण, कर्ण कभी रोका नही,
हो गया मृत्य6को समर्पित, मैदान में जुका नही।।
था खलनायक के साथ, फिरभी वो महान रहा,
कृष्ण अर्जुन के साथी, दुर्योधन का भगवान रहा।।
लिखी जाती है कहानिया, वो महान दानी की,
भगवान के सामने लड़ा, इज्जत रखी जुबानी की।।
मनोज ने लिखी बाते, इतने मे कर्ण कैसे आएगा,
एक वचन की ख़ातिर वो फिर हथियार उठाएगा।।
मनोज संतोकि मानस