आदमी है उम्र होने पर वो ढल जायेगा,
पेट से पैदा हुवा, मिट्टी में गल जायेगा।।
वक़्त का मंच है, कौन किसका है यहा,
तूने जिसको अपना कहा बदल जायेगा।
कई राज अभी भी मेरे दिल मे पड़े है,
ख़ाक तब होगा, जब में जल जायेगा।।
वो मंजर खूब देखे है हमने तुफानो के,
महोब्बत की तो लगा संभल जायेगा।।
कई सिकंदर दफन हो गये इस मिट्टी में,
भ्रम है वक़्त से पहेले निकल जायेगा।।
राम गये सरियू में, कृष्ण को लगा बाण,
मौत से बचकर तू जग में किधर जायेगा।।
काल की चौनीति मनोज ने गले लगाई,
जरा आग लगा दो शरीर पिधल जायेगा।।
मनोज संतोकि मानस