हो रहा संग्राम देखो, माता का अपनाम देखो,
आंसू से भीगी सुबह हेज़ सुलाती शाम देखो।
निस्तब्ध हो रही दिशाए, कुचल गई आशाए,
खाक हो रहे घर का बनता तुम स्मशान देखो।
संदीप्त हो रहा मनुज, भीड़ रहे जेष्ट से अनुज,
तमस की आग में जल रहे यहां तमाम देखो।
सत्य की नही पहचान, सब अपने में भगवान,
बुरा कहने वाले, अपने पर लगे इल्जाम देखो।
तपता हुए सूर्य ढल रहा है, चाँद मचल रहा है,
मनोज गुमान का अंत है, बस यह पैगाम देखो।
मनोज संतोकि मानस
-Manoj Santoki Manas