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*जब इंसान अपनी गलतियों का "वकील"*
*और*
*दूसरों की गलतियों का "जज" बन जाये*
*तो*
*"फैसले"नहीं "फासले" हो जाते है ....
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*लब्ज सिर्फ चुभते हैं*
*ख़ामोशियाँ मार ही देती हैं*
? *मुठ्ठियों में क़ैद हैं जो खुशियाँ*
*वो बांट दो यारो,*
*ये हथेलियां तो इक दिन वैसे भी*
*खुल ही जानी हैं।*?
? *"उम्मीदों"* से बंधा,
एक *जिद्दी* परिंदा है *इंसान*
? जो *घायल* भी
*"उम्मीदों"* से है और,
*जिन्दा* भी *"उम्मीदों"* पर हैं..
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*सुखी होने के चक्कर में जो*
*पूरी जिंदगी दुखी रहता*
*हैं*......
*उसी का नाम इंसान है*...!!
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? Good-Morning?
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