ट्राँसफर होने पर हमने जो मकान लिया वह था तो इनडिपेंडैंट ,मगर और एक किरायेदार भी वहीं से निकलते. गाड़िंयाँ रखते थे. मुख्यद्वार के पहले ही वह बरामदा और खुला प्राँगण था.
दूसरे में एक सज्जन ऐसे थे कि न तो सफाई पर ध्यान दें वहाँ की, न ही मेरी सुनें .कई बार प्रेम से हाथ जोड़कर निवेदन किया ,पर वह क्यों माने !! गाड़ी भी धोयें वहीं, वहीं बैठकर मूँगफली खायें ,छिलके फेंककर चले जायें .मेरे बोलने पर तो फिर भीतर से सारा कचरा ही बाहर करने लगे.
तब मैंने की #गाँधीगिरी , जैसे ही वह कचरा फेकें, मैं जाकर साफ कर आऊँ.बिना कुछ कहे .
पंद्रह दिन तक उन्होंने चुपके से चैक किया कि मैं बोल नहीं रही वल्कि मौन रहकर उनकी छोड़ी गई गंदगी स्वयं साफ कर देती हूँ .
अब उन्हें न जाने क्या हुआ . न तो वे कचरा फेकते , न ही गंदा करते .यदि हो जाता तो स्वयं ही सफाई करने लगे. तो थोड़े दिनों की #गाँधीगिरी से मुझे हमेशा की राहत मिल गई. यह मेरे लिये बड़ी सीख साबित हुयी, जिसे मैंने जिंदगी में कई बार आजमाया.