आज मन व्यथित है, ना जाने क्यों? शायद, सपने में फिर से उसका इस तरह से आ जाना, खला मुझे। आँख खुली है लेकिन पलके झपक रही है। यह किस्सा उस वक़्त का है, जब दिल रूपी दुनिया में एक नया आशियाना उसके चेहरे ने बनाना शुरू कर दिया था। हर रोज उसकी गली से गुजरना और उसके घर से थोड़ी दूर खड़े होकर उसकी राह तकना। समय से देर होने पर किसी आशँका से मन का विचलित हो जाना। खैर, यह दौर चलता रहा और चला भी गया। दिल में उपजने वाले उस अँकुरित बीज का अफसाना, उससे ना कह पाया और वो दौर चला गया। और आज इस दौर में खुद को व्यथित करके अपने नाकामियों को छिपा रहा हूँ। काश! अपने कदम पीछे ना खींचे होते तो शायद आज वो मेरी दुनिया होती। बस एक इसी ख्याल में इस दौर को जी रहा हूँ और आनेवाले दौर को जीता जाऊँगा। शायद , आज मन व्यथित है।
©दिव्य प्रकाश