वो यहीं है (1)
हाँ, वो अकसर मुझे देखा करता है, दूर आसमान से, जब बारिश होती है तो लगता है उसका इश्क़ है जो मुझ पर बेतहाशा बरस रहा है।
हवा का छूकर गुज़रना उसका स्पर्श याद दिला जाता है,
आज भी कहीं मेरा दुपट्टा फस जाता है तो चोंक जाती हूँ..
मैं आज भी उसकी मौजूदगी को जी रही हूँ..।
सुबह-सुबह मेरे कमरे की खिड़की से आती सूरज की किरणें जब मुझे जागने पर मजबूर करती हैं, तो महसूस करती हूँ वो कहीं है जहाँ से मुझे चिढ़ा रहा है। और कह रहा है कितना सोती हो, अब तो उठ जाओ.....
वो अकसर मुझे पागल कहता था, क्योंकि मैं उससे रोज एक बार टकरा जाती थी, कहीं फर्श पर फिसल जाती थी। और जब मुझे काम करता देख मुझसे कहता आराम से संभल कर करो तब मैं ज़रूर सब कुछ खराब कर कुछ ना कुछ तोड़ अनजाने में उसकी मुस्कुराहट की वज़ह बन जाया करती थी।
मैं उसके ही ऑफिस में काम करती थी, और आज भी करती हूँ, वो मेरा बॉस था..
उसकी मोहब्बत की वज़ह शायद मेरा यही बेपरवाही वाला व्यवहार था, मेरा घबराकर हकलाती ज़ुबान में उसके सवालों का जवाब देना, सब कुछ उसे मेरे करीब करता जा रहा था। मैं उसे जवाब देने में अकसर ही शब्दों की जगह बदल दिया करती थी, जैसे एक बार उसने मुझे परेशान देख पूछा, तबियत तो ठीक है..??
मैंने उम्मीद ही नहीं की थी कि वो मुझसे ये सवाल करेगा.. मेरा जवाब सुन वो बहुत हँसा मुझ पर.. क्योंकि अपनी घबराहट को दबाने की कोशिश में मैंने उससे कहा.. हाँ, मतलब नहीं, दरअसल सोना आ रहा है, चक्कर चाहती हूँ.... आप समझ चुके होंगे मैं क्या कहना चाह रही थी।
जब एक बार बेईरादा मेरे ज़्यादा करीब बैठा, और दूसरे लोगों से बात कर रहा था, तो मेरी बोलती बंद हो चुकी थी, मैं ना किसी को सुन पा रही थी, ना कुछ कह पा रही थी। और सच कहूँ तो मैं वहाँ से उठ कर दूर बैठने की भी हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। वो हमेशा मुझसे कहता था, मुझे देख भागती क्यों हो, ये पीछे पैर क्यों करने लग जाती हो, मैं हमेशा की तरह कहती आप भी तो आगे आते हैं।
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क्रमशः
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