पसंद पसंद से ही की थी,
बहुत पसंद थे तुम मुझे.
इसी बात का मलाल रहा,
पसंद के लिये खुद बदल गये हम ,
पसंद को पसंद न आया फिर भी.
मैं तुम्हें पसंद निकली कुछ शर्तों पर ,
पसंद को अपनी पसंद में ढालने के. लिये,आपने क्या क्या न किया .
आप तंज कसते हैं फिर भी ,
.तुम पहले से अब क्यों न रहे
शोभा शर्मा .
?आपकी हमारी दुनिया की कविता ,यही होता था ,होता आया है और होता रहेगा ?पसंद आये ?तो दो शब्द लिख भेजिये?
शोभा शर्मा.